स्वतंत्र या परतंत्र
यूं तो कहने को हम 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों के निरंकुश शासन से आजाद हो गए थे पर क्या हम सच्चे मायनों में आजाद हैं या अपनों के हाथों अपनी स्वतंत्रता खो चुके हैं देश की आबादी का 90% हिस्सा आज प्रभावित है। कुछ का कहना है कि 70 साल से कुछ नहीं हुआ पर उन्हीं के मित्रों का कहना है कि रुपए की यह हालत 71 साल में इतनी खोखली कभी नहीं हुई। लोकतंत्रलोकतंत्र के प्रहरियों की जवाबदेही जैसे खत्म सी हो गई है। हमारा स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को जबरदस्त तरीके से मनाना एक पाखंड सा प्रतीत होता है ना ही हम ईमानदार हैं ना ही हम देश भक्त हैं और ना ही हम इस भारत माता के द्वारा किए अनगिनत एहसानों को मानते हैं चाहे राजनीति में स्थापित बड़े लोग हो या उच्च पदों पर आसीन नौकरशाह सभी को खर्चा पानी चाहिए भ्रष्टाचार ने जैसे अमन चैन और शांति का गला घोट दिया हो चाहे नरम दल हो ,चाहे गरम दल हो उनके त्याग और बलिदान को तो जैसे कलयुग की औद्योगिक क्रांति और संचार क्रांति की भेंट चढ़ा दिया गया है इस कलयुग सभी को पैसा चाहिए चाहें उसको प्राप्त करने का रास्ता कुछ भी हो।जिन्हें खुद के लिए या अपने परिवार के लिए पैसा नहीं चाहिए वो दूसरों के लिए खदानें जुटाने में लगे है ,सब आदर्श नियम ताक पर रख कर।हमारे देश का किसान ,आम आदमी जिस तरह से वक्त और राजनीति के दो पाटो में पिस रहा है पीसा जा रहा है तो इस स्वतंत्रता के आदर्शों पर जरा शक सा होता है हो सकता है कि आप मेरे विचारों से सहमत नहीं हों पर 100% आपका संपादक यह विचारधारा थोपना भी नहीं चाहता है । हमने देश के लिए कि किया भी क्या है? अगर वाकई हम शहीदों की शहादत को सच्चे अर्थों में श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो हमें देश प्रेमी , ईमानदार,भ्रष्टाचार मुक्त जवाबदेह होना होगा और ये किसी एक के करने से नहीं अपितु अपने स्तर पर हर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े भारतीय को सोचना होगा,करना होगा,बनाना होगा।
जय हिंद जय भारत
यूं तो कहने को हम 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों के निरंकुश शासन से आजाद हो गए थे पर क्या हम सच्चे मायनों में आजाद हैं या अपनों के हाथों अपनी स्वतंत्रता खो चुके हैं देश की आबादी का 90% हिस्सा आज प्रभावित है। कुछ का कहना है कि 70 साल से कुछ नहीं हुआ पर उन्हीं के मित्रों का कहना है कि रुपए की यह हालत 71 साल में इतनी खोखली कभी नहीं हुई। लोकतंत्रलोकतंत्र के प्रहरियों की जवाबदेही जैसे खत्म सी हो गई है। हमारा स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को जबरदस्त तरीके से मनाना एक पाखंड सा प्रतीत होता है ना ही हम ईमानदार हैं ना ही हम देश भक्त हैं और ना ही हम इस भारत माता के द्वारा किए अनगिनत एहसानों को मानते हैं चाहे राजनीति में स्थापित बड़े लोग हो या उच्च पदों पर आसीन नौकरशाह सभी को खर्चा पानी चाहिए भ्रष्टाचार ने जैसे अमन चैन और शांति का गला घोट दिया हो चाहे नरम दल हो ,चाहे गरम दल हो उनके त्याग और बलिदान को तो जैसे कलयुग की औद्योगिक क्रांति और संचार क्रांति की भेंट चढ़ा दिया गया है इस कलयुग सभी को पैसा चाहिए चाहें उसको प्राप्त करने का रास्ता कुछ भी हो।जिन्हें खुद के लिए या अपने परिवार के लिए पैसा नहीं चाहिए वो दूसरों के लिए खदानें जुटाने में लगे है ,सब आदर्श नियम ताक पर रख कर।हमारे देश का किसान ,आम आदमी जिस तरह से वक्त और राजनीति के दो पाटो में पिस रहा है पीसा जा रहा है तो इस स्वतंत्रता के आदर्शों पर जरा शक सा होता है हो सकता है कि आप मेरे विचारों से सहमत नहीं हों पर 100% आपका संपादक यह विचारधारा थोपना भी नहीं चाहता है । हमने देश के लिए कि किया भी क्या है? अगर वाकई हम शहीदों की शहादत को सच्चे अर्थों में श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो हमें देश प्रेमी , ईमानदार,भ्रष्टाचार मुक्त जवाबदेह होना होगा और ये किसी एक के करने से नहीं अपितु अपने स्तर पर हर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े भारतीय को सोचना होगा,करना होगा,बनाना होगा।
जय हिंद जय भारत
टिप्पणियाँ